कोरोना मृतकों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार कर रहे विष्णु व टीम को सलाम

जयपुर। सवाई मानसिंह अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के सुपरवाइजर 27 वर्षीय विष्णु गुर्जर कोरोना संकट से पहले कभी कब्रिस्तान नहीं गए थे, लेकिन अब तक करीब 30 कोरोना मृतकों को आखिरी मिट्टी दे चुके हैं। वह और उनके साथी मिलकर 70 से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार अपने हाथों से कर चुके हैं। ये कोरोना के वो योद्धा हैं, जो जोखिम भरा, लेकिन मानवता का काम कर रहे हैं। ये अनजाने ही उन कोरोना मृतकों के सबसे करीबी बन गए है, जिनके यूं तो भरे-पूरे परिवार हैं, लेकिन कोरोना ने उन्हें अंतिम समय में अपनों से दूर कर दिया। जयपुर में सभी कोरोना मृतकों का अंतिम संस्कार विष्णु और उनके साथियों पंकज, मनीष, मंगल, अर्जुन, सूरज ने किया है।
विष्णु और उनके साथी अस्पताल में ठेके पर काम करते हैं और कोरोना महामारी ने उन्हें एक ऐसा काम करने की जिम्मेदारी सौंप दी, जो शायद आमतौर पर कोई नहीं करना चाहता। लेकिन विष्णु और उसकी टीम पूरी मुस्तैदी से यह काम कर रही है। विष्णु का कहना है कि जिनका कोई नहीं उसका विष्णु है। कोई आधी रात निकल को भी फोन करेगा तो हम तैयार हैं। किसी शव को जलाना या सुपुर्द-ए-खाक करना सबसे बड़ा भार भी है और धर्म भी। मैं आज तक किसी कब्रिस्तान में नहीं गया था। लेकिन कोरोना से दूसरों को संक्रमण से बचाना था, इसलिए मैंने और मेरी टीम ने इस जिम्मेदारी को लिया। आज हम कब्र भी खुदवाते हैं और उसमें उतरकर आखिरी मिट्टी भी हम देते हैं। हर बार जब कोरोना पीडि़त की मौत के बाद शव हमारे पास लाया जाता है तो दिल में डर सा लगता है। हालांकि दिमाग में धर्म का बोध होते ही सब कुछ शांत सा हो जाता है। विष्णु बताते हैं कि कोरोना पॉजिटिव मरीजों का अंतिम संस्कार उनके परिवार वाले नहीं कर सकते। कुछ तो डर के मारे आते भी नहीं हैं। हमने कई अंतिम संस्कार ऐसे किए हैं, जिनमें मृतक के परिवार का कोई सदस्य नहीं था। सारा काम हमने किया। हम सुबह ईश्वर से एक ही प्रार्थना करते हैं कि आज हमें किसी लाश का अंतिम संस्कार नहीं करना पड़े। जिस दिन एक भी मौत नहीं होती है तो हमें बेहद खुशी होती है। विष्णु को बस एक शिकायत है कि कोरोना संक्रमण से निपटने में काम कर रहे सब लोगों को इतना सम्मान मिल रहा है, लेकिन उन्हें कोई एक फूल भी देने नहीं आया। विष्णु और उनके साथी इस पोस्टमार्टम हाउस में सात साल से काम कर रहे हैं। पोस्टमार्टम में भी मदद करते हैं। इनका ठेकेदार इन्हें 229 रुपए प्रतिदिन देता है और जयपुर नगर निगम शवों के अंतिम संस्कार के लिए छह घंटे की एक शिफ्ट के 500 रुपए देता है। इस दौरान चाहे इन्हें कितने भी अंतिम संस्कार करने पड़ें। विष्णु और उनके साथी अस्पताल के पास ही बनी एक धर्मशाला में रह रहे हैं, वह अपने घर भी नहीं जाते हैं। विष्णु का तीन साल का बेटा और छह माह की बेटी है, जिससे वे 40 दिन बाद एक बार मिल पाए हैं। उनके साथी पंकज की तो शादी तक टल गई है।

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